in

पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा

जो इंसान एक बार अपने सपनों को पूरा करने के लिए दृढ़ हो जाए और अपनी समस्त ताकत को उस सपने को पूरा करने में लगा दे तो फिर कोई भी कठिन परिस्थिति उसका सिर नहीं झुका सकती।

“टूटने लगे हौसले तो ये याद रखना ,
बिना मेहनत के तख्तो-ताज नहीं मिलते।
ढूंढ़ लेते हैं अंधेरों में मंजिल अपनी ,
क्योंकि जुगनू कभी रौशनी के मोहताज़ नहीं होते।”

जो इंसान एक बार अपने सपनों को पूरा करने के लिए दृढ़ हो जाए और अपनी समस्त ताकत को उस सपने को पूरा करने में लगा दे तो फिर कोई भी कठिन परिस्थिति उसका सिर नहीं झुका सकती। कई बार मनुष्य की परिस्थितियाँ ही न केवल उसके लक्ष्य में बाधा डालती है बल्कि उसका अपना शरीर भी उसको आगे बढ़ने से रोकता है।

कुछ ऐसी ही दर्दनाक घटना घटी अरुणिमा सिन्हा के साथ। जिसमे उन्होंने अपने पैरो को खोने के बावजूदमाउंट एवरेस्ट पर भारत का परचम लहरा कर अपनी एक विश्व स्तरीय पहचान बनाई। तो आज हम आपको रूबरू करवाएंगे अरुणिमा सिन्हा के साहस से विजय तक के सफर को। क्योकि कमजोरी को ताकत बनाना हर इंसान के बस में नहीं है।


क्या आप कल्पना कर सकते है जिस महिला को लूटने के इरादे से आधी रात में चलती ट्रेन से लूटने का प्रयास किया जाय वो उस महिला से जीत न पाने की वजह से चलती ट्रेन से बाहर फेक दिया जाय इतना ही नही फेकने के बाद पटरियों में अपने पैर जो महिला गवा दे क्या ऐसी महिला एवेरेस्ट को भी फतह कर लेगी लेगी ऐसा कारनामा एवेरेस्ट से भी ऊँचा हौसला रखने वाली महिला अरुणिमा सिन्हा ने सच कर दिखाया है

अरुणिमा सिन्हा का जन्म सन 1988 में भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के अम्बेडकर नगर जिले के शहजादपुर इलाके के पंडाटोला मुह्हले में हुआ था बचपन से वालीवाल में रूचि रखने वाली अरुणिमा सिन्हा भारत को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना इनका मुख्य ध्येय था जैसे जैसे समय बीतता गया अरुणिमा सिन्हा अपनी पढ़ाई को पूरी करते हुए अरुणिमा सिन्हा की पहचान राष्ट्रिय स्तर पर वालीवाल खिलाडी के रूप में होने लगी .

इसी कड़ी में वे अपने Carreer में आगे बढ़ती गयी लेकिन जिंदगी में तमाम
परेशानीयो का सामना करना पड़ा लेकिन अरुणिमा सिन्हा हर मौके को अपनी सफलता के रूप में भुनाया वो कहते है न दोस्तों हर किसी के जीवन में कभी कभी ऐसा भी वक्त आता है जो इंसान के जीवन को बदलकर रख देता है ऐसा ही कुछ अरुणिमा सिन्हा के साथ भी हुआ जो अरुणिमा सिन्हा 11 अप्रैल 2011 की वो काली रात कभी नही भूल सकती

अरुणिमा सिन्हा 11 अप्रैल 2011 को पद्मावती एक्सप्रेस (Padmavati Express) से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी रात के लगभग एक बजे कुछ शातिर अपराधी ट्रैन के डिब्बो में दाखिल हुए और अरुणिमा सिन्हा को अकेला देखकर उनके गले की चैन छिनने का प्रयास करने लगे जिसका विरोध अरुणिमा सिन्हा ने किया तो उन शातिर चोरो ने अरुणिमा सिन्हा को चलती हुई ट्रैन बरेली के पास बाहर फेक दिया जिसकी वजह से अरुणिमा सिन्हा का बाया पैर पटरियों के बीच में आ जाने से कट गया पूरी रात अरुणिमा सिन्हा कटे हुए पैर के साथ दर्द से चीखती चिल्लाती रही लगभग 40 – 50 ट्रैन गुजरने के बाद पूरी तरह से अरुणिमा सिन्हा अपने जीवन की आस खो चुकी थी लेकिन शायद अरुणिमा सिन्हा के जीवन के किस्मत को कुछ और ही मंजूर था 

फिर लोगो को इस घटना के पता चलने के बाद इन्हें नई दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया जहा अरुणिमा सिन्हा अपने जिंदगी और मौत से लगभग चार महीने तक लड़ती रही और जिंदगी और मौत के जंग में अरुणिमा सिन्हा की जीत हुई और फिर अरुणिमा सिन्हा के बाये पैर को कृत्रिम पैर के सहारे जोड़ दिया गया


अरुणिमा सिन्हा के इस हालत को देखकर डॉक्टर भी हार मान चुके थे और उन्हें आराम करने की सलाह दे रहे थे जबकि परिवार वाले और रिस्तेदारो के नजर में अब अरुणिमा सिन्हा कमजोर और विंकलांग हो चुकी थी लेकिन अरुणिमा सिन्हा ने अपने हौसलो में कोई कमी नही आने दी और किसी के आगे खुद को बेबस और लाचार घोषित नही करना चाहती थी जब अरुणिमा सिन्हा पूरी तरह से ठीक हो गयी तो उन्होंने तुरन्त अपने हौसलो को एक नई उड़ान देने के लिए दुनिया के
सबसे उची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने का मन ठान लिया


जरा सोचिये जो शरीर से हष्टपुष्ट होता है उसके भी पैर एवेरेस्ट फतह के नाम से डगमगाने लगते है ऐसे में अगर कोई भी अरुणिमा सिन्हा के इस फैसले को सुनता तो दातो तले ऊँगली दबा लेता.
लेकिन अरुणिमा सिन्हा के हौसला माउंट एवरेस्ट से भी ऊँचा था और अपनी इसी इच्छा को पूरी करने के लिए वे एवेरेस्ट फतह करने वाली प्रथम भारतीय महिला बछेंद्री पाल /Bachendri Pal से मिलने जमशेदपुर जा पहुची


अरुणिमा सिन्हा के इस हालत को देखते हुए पहले बछेन्द्री पाल ने उन्हें आराम करने की सलाह दी लेकिन अरुणिमा सिन्हा के बुलन्द हौसलो के वे नतमस्तक हो गयी और बोली तुमने तो अपने हौसलो तो एवरेस्ट से भी उचे है बस इसे अपनी तुम्हे अपनी फतह की तारीख लिखनी है इसके बाद अरुणिमा सिन्हा बछेंद्री पाल की निगरानी में लेह से नेपाल, लद्दाख में पर्वतारोहण के गुर सीखी

फिर पूरी तरह से तैयार होने के बाद अरुणिमा सिन्हा ने एक नए इतिहास लिखने की तैयारी में 31 मार्च 2013 को मांउट एवेरेस्ट चढाई की शुरुआत कर दी और फिर 52 दिनों की दुश्वार चढ़ाई और ठंड से कपा देने वाली बर्फ को पार करते हुए एक नए उचाई की इबारत लिखते हुए अरुणिमा सिन्हा ने 21 मई 2013 को माउंट एवेरेस्ट फतह कर लिया और इतिहास में प्रथम विकलांग महिला एवेरस्ट फतह करने वाली महिला / Handicaped First Woman to Climb Mount Everst बन गयी

अपनी कमजोरी को ही ताकत बना लेना ऐसा मिशाल कोई अरुणिमा सिन्हा से ही सीख सकता है वो कहते है न की जब हमारे इरादे बुलन्द हो तो एवेरेस्ट सरीखा चट्टान भी हमारे लक्ष्य को डिगा नही सकता ऐसा ही कारनामा अरुणिमा सिन्हा ने भी कर दिया जो की अपनी जिंदगी से हार मानने वालो के लिए भी एक सबक है।


अरुणिमा सिन्हा भी चाहती तो औरो की तरह अपनी कमजोरी को अपनी बेबसी और लाचारी मानकर चुपचाप बैठ जाती और जिंदगी में कभी आगे नही बढ़ पाती और पूरा जीवन दुसरो के सहारे गुजरना पड़ता लेकिन एवरेस्ट से भी ऊँचा हौसला रखने वाली अरुणिमा सिन्हा ने अपने जीवन में कभी हार नही मानी, मुश्किल हालात सबके जीवन में आते है
लेकिन विजयी वही होता है जिनके इरादे बुलन्द होते है ऐसी सोच रखने वाली

अरुणिमा सिन्हा जैसे ही लोग हमारे देशभारत की शान है

                                                                                                             playonindia

What do you think?

Written by playon

उड़न सिख मिल्खा सिंह

‘क्वीन ऑफ एशिया इन द माइल’